ग़ज़ल
उल्टी हो गईं सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम किया
उल्टी हो गईं सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम कियादेखा इस बीमारी-ए-दिल ने आख़िर काम तमाम किया
अहद-ए-जवानी रो रो काटा पीरी में लीं आँखें मूँदयानी रात बहुत थे जागे सुब्ह हुई आराम किया
नाहक़ हम मजबूरों पर ये तोहमत है मुख़्तारी कीचाहते हैं सो आप करें हैं हम को अबस बदनाम किया
सारे रिंद ओबाश जहाँ के तुझ से सुजूद में रहते हैंबाँके टेढ़े तिरछे तीखे सब का तुझ को इमाम किया
किस का काबा कैसा क़िबला कौन हरम है क्या एहरामकूचे के उस के बाशिंदों ने सब को यहीं से सलाम किया
याँ के सपेद ओ सियह में हम को दख़्ल जो है सो इतना हैरात को रो रो सुब्ह किया या दिन को जूँ तूँ शाम किया
शेख़ जो है मस्जिद में नंगा रात को था मय-ख़ाने मेंजुब्बा ख़िर्क़ा कुर्ता टोपी मस्ती में इनआम किया
मीर के दीन ओ मज़हब को अब पूछते क्या हो उन ने तोक़श्क़ा खींचा दैर में बैठा कब का तर्क इस्लाम किया