ग़ज़ल
जो इस शोर से मीर रोता रहेगा
जो इस शोर से मीर रोता रहेगातो हम-साया काहे को सोता रहेगा
मैं वो रोने वाला जहाँ से चला हूँजिसे अब्र हर साल रोता रहेगा
मिरे अश्क भी हैं पसीने के मानिंदकहाँ तक कोई मुँह को धोता रहेगा
यही जान लो ज़र्द-रूई से मेरीकि कुंदन इसी रंग होता रहेगा
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