ग़ज़ल

हस्ती अपनी हबाब की सी है

मीर तक़ी मीर · सब कलाम देखें
हस्ती अपनी हबाब की सी हैये नुमाइश सराब की सी है
नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिएपंखुड़ी इक गुलाब की सी है
चश्म-ए-दिल खोल इस भी आलम परयाँ की औक़ात ख़्वाब की सी है
बार बार उस के दर पे जाता हूँहालत अब इज़्तिराब की सी है
मैं जो बोला कहा कि ये आवाज़उसी ख़ाना-ख़राब की सी है
मीर उन नीम-बाज़ आँखों मेंसारी मस्ती शराब की सी है
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