ग़ज़ल

गुल को महबूब मैं क़यास किया

मीर तक़ी मीर · सब कलाम देखें
गुल को महबूब मैं क़यास कियाफ़र्क़ निकला बहुत जो बास किया
सुब्ह तक शम्अ' सर को धुनती रहीक्या पतंगे ने इल्तिमास किया
दिल ने हम को विसाल में भी 'मीर'याद-ए-हिज्राँ से ना-सिपास किया