ग़ज़ल
फ़क़ीराना आए सदा कर चले
फ़क़ीराना आए सदा कर चलेमियाँ ख़ुश रहो हम दुआ कर चले
जो तुझ बिन न जीने को कहते थे हमसो इस अहद को अब वफ़ा कर चले
कोई ना-उमीदाना करते निगाहसो तुम हम से मुँह भी छिपा कर चले
बहुत आरज़ू थी गली की तिरीसो याँ से लहू में नहा कर चले
दिखाई दिए यूँ कि बे-ख़ुद कियाहमें आप से भी जुदा कर चले
जबीं सज्दा करते ही करते गईहक़-ए-बंदगी हम अदा कर चले
परस्तिश की याँ तक कि ऐ बुत तुझेनज़र में सबों की ख़ुदा कर चले
गई उम्र दर बंद-ए-फ़िक्र-ए-ग़ज़लसो इस फ़न को ऐसा बुरा कर चले
कहें क्या जो पूछे कोई हम से 'मीर'जहाँ में तुम आए थे क्या कर चले