ग़ज़ल
अए हम-सफ़र न आब्ले
अए हम-सफ़र न आब्ले को पहुँचे चश्म-ए-तरलगा है मेरे पाओं में आ ख़ार देखना
होना न चार चश्म दिक उस ज़ुल्म-पैशा सेहोशियार ज़ीन्हार ख़बरदार देखना
सय्यद दिल है दाग़-ए-जुदाई से रश्क-ए-बाग़तुझको भी हो नसीब ये गुलज़ार देखना
गर ज़मज़मा यही है कोई दिन तो हम-सफ़रइस फ़स्ल ही में हम को गिरफ़्तार देखना
बुल-बुल हमारे गुल पे न गुस्ताख़ कर नज़रहो जायेगा गले का कहीं हार देखना
शायद हमारी ख़ाक से कुछ हो भी अए नसीमग़िर्बाल कर के कूचा-ए-दिलदार देखना
उस ख़ुश-निगाह के इश्क़ से परहेज़ कीजिओ 'मीर'जाता है लेके जी ही ये आज़ार देखना
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