ग़ज़ल

आए हैं मीर मुँह को बनाए

मीर तक़ी मीर · सब कलाम देखें
आए हैं मीर मुँह को बनाए जफ़ा से आजशायद बिगड़ गयी है उस बेवफा से आज
जीने में इख्तियार नहीं वरना हमनशींहम चाहते हैं मौत तो अपने खुदा से आज
साक़ी टुक एक मौसम-ए-गुल की तरफ़ भी देखटपका पड़े है रंग चमन में हवा से आज
था जी में उससे मिलिए तो क्या क्या न कहिये 'मीर'पर कुछ कहा गया न ग़म-ए-दिल हया से आज
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