ग़ज़ल
गम रहा जब तक कि दम में दम रहा
ग़म रहा जब तक कि दम में दम रहादिल के जाने का निहायत ग़म रहा
दिल न पहुँचा गोशा-ए-दामन तलकक़तरा-ए-ख़ूँ था मिज़्हा पे जम रहा
जामा-ए-अहराम-ए-जाहिद पर न जाथा हरम में लेक ना-महरम रहा
ज़ुल्फ़ खोले तू जो टुक आया नज़रउम्र भर याँ काम-ए-दिल बरहम रहा
उसके लब से तल्ख़ हम सुनते रहेअपने हक़ में आब-ए-हैवाँ सम रहा
हुस्न था तेरा बहुत आलम फरेबखत के आने पर भी इक आलम रहा
मेरे रोने की हकीकत जिस में थीएक मुद्दत तक वो क़ाग़ज़ नम रहा
सुबह पीरी शाम होने आई `मीर'तू न जीता, याँ बहुत दिन कम रहा
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