ग़ज़ल बे-ख़ुदी ले गई कहाँ हम को मीर तक़ी मीर · सब कलाम देखें हिन्दी रोमन बे-ख़ुदी ले गई कहाँ हम कोदेर से इंतिज़ार है अपनारोते फिरते हैं सारी सारी रातअब यही रोज़गार है अपनादे के दिल हम जो हो गए मजबूरइस में क्या इख़्तियार है अपना