ग़ज़ल

ज़ख्म झेले दाग़ भी खाए बोहत

मीर तक़ी मीर · सब कलाम देखें
ज़ख्म झेले दाग़ भी खाए बोहतदिल लगा कर हम तो पछताए बोहत
दैर से सू-ए-हरम आया न टुकहम मिजाज अपना इधर लाये बोहत
फूल, गुल, शम्स-ओ-क़मर सारे ही थेपर हमें उनमें तुम ही भाये बोहत
रोवेंगे सोने को हमसाये बोहत
मीर से पूछा जो मैं आशिक हो तुमहो के कुछ चुपके से शरमाये बोहत
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