ग़ज़ल
आँखों में जी मेरा है इधर यार देखना
आँखों में जी मेरा है इधर यार देखनाआशिक़ का अपने आख़री दीदार देखना
कैसा चमन के हम से असीरों को मना हैचाक-ए-क़फ़स से बाग़ की दीवार देखना
आँखें चुराईओ न टुक अब्र-ए-बहार सेमेरी तरफ़ भी दीदह-ए-ख़ँबार देखना
अए हम-सफ़र न आब्ले को पहुँचे चश्म-ए-तरलगा है मेरे पाओं में आ ख़ार देखना
होना न चार चश्म दिक उस्स ज़ुल्म-पैशाह सेहोशियार ज़ीन्हार ख़बरदार देखना
सय्यद दिल है दाग़-ए-जुदाई से रश्क-ए-बाग़तुझ को भी हो नसीब ये गुलज़ार देखना
गर ज़मज़मा यही है कोई दिन तो हम-सफ़ीरइस फ़स्ल ही में हम को गिरिफ़्तार देखना
बुल-बुल हमारे गुल पे न गुस्ताख़ कर नज़रहो जायेगा गले का कहीं हार देखना
शायद हमारी ख़ाक से कुछ हो भी अए नसीमग़िर्बाल कर के कूचा-ए-दिलदार देखना
उस ख़ुश-निगाह के इश्क़ से परहेज़ कीजिओ 'मीर'जाता है लेके जी ही ये आज़ार देखना
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