ग़ज़ल

चुनिन्दा अश्आर- भाग चार

मीर तक़ी मीर · सब कलाम देखें
३१.‘मीर’ बन्दों से काम कब निकलामाँगना है जो कुछ ख़ुदा से माँग३२.कहता है कौन तुझको याँ यह न कर तू वोह करपर हो सके तो प्यारे दिल में भी टुक जगह कर३३.ताअ़त कोई करै है जब अब्र ज़ोर झूमे ?गर हो सके तो ज़ाहिद ! उस वक़्त में गुनह कर३४.क्यों तूने आख़िर-आख़िर उस वक़्त मुँह दिखायादी जान ‘मीर’ ने जो हसरत से इक निगह कर३५.आगे किसू के क्या करें दस्तेतमअ़ दराज़ये हाथ सो गया है सिरहाने धरे-धरे३६.न गया ‘मीर’ अपनी किश्ती सेएक भी तख़्ता पार साहिल तक३७.गुल की जफ़ाभी देखी,देखी वफ़ा-ए-बुलबुलइक मुश्त पर पड़े हैं गुलशन में जा-ए-बुलबुल
३८.आग थे इब्तिदा-ए-इश्क़ में हमहो गए ख़ाक इन्तिहा है यह४०.पहुँचा न उसकी दाद को मजलिस में कोई रातमारा बहुत पतंग ने सर शम्अदान पर
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