ग़ज़ल

अब जो इक हसरत-ए-जवानी है

मीर तक़ी मीर · सब कलाम देखें
अब जो इक हसरत-ए-जवानी हैउम्र-ए-रफ़्ता की ये निशानी है।
ख़ाक थी मौजज़न जहाँ में, औरहम को धोखा ये था के पानी है।
गिरिया हर वक़्त का नहीं बेहेचदिल में कोई ग़म-ए-निहानी है।
हम क़फ़स ज़ाद क़ैदी हैं वरनाता चमन परफ़शानी है।
याँ हुये 'मीर' हम बराबर-ए-ख़ाकवाँ वही नाज़-ओ-सर्गिरानी है।
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