ग़ज़ल

चुनिन्दा अश्आर- भाग दो

मीर तक़ी मीर · सब कलाम देखें
११.सुबह तक शम्अ सर को धुनती रहीक्या पतंगे ने इल्तमास किया
१२.दाग़े-फ़िराक़ -ओ-हसरते-वस्ल , आरज़ू-ए-शौक़मैं साथ ज़ेरे-ख़ाक़ भी हंगामा ले गया१३.शुक्र उसकी जफ़ा का हो न सकादिल से अपने हमें गिला है यह१४.अपने जी ही ने न चाहा कि पिएँ आबे-हयातयूँ तो हम मीर उसी चश्मे-पेहुए१५.चमन का नाम सुना था वले न देखा हायजहाँ में हमने क़फ़स ही में ज़िन्दगानी की१६.कैसे हैं वे कि जीते हैं सदसाल हम तो ‘मीर’इस चार दिन की ज़ीस्त में बेज़ार हो गए१७.तुमने जो अपने दिल से भुलाया हमें तो क्याअपने तईं तो दिल से हमारे भुलाइये१८.परस्तिश की याँ तक कि ऐ बुत! तुझेनज़र में सभू की ख़ुदा कर चले१९.यूँ कानों कान गुल ने न जाना चमन में आहसर लो पटक के हम सरे बाज़ार मर गए२०.सदकारवाँ वफ़ाहै कोई पूछ्ता नहींगोया मताए-दिल के ख़रीदार मर गए
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh