ग़ज़ल

काबे में जाँबलब थे हम दूरी-ए-बुताँ से

मीर तक़ी मीर · सब कलाम देखें
काबे में जाँबलब थे हम दूरी-ए-बुताँ सेआये हैं फिर के यारों अब के ख़ुदा के याँ से
जब कौंधती है बिजली तब जानिब-ए-गुलिस्ताँरखती है छेड़ मेरे ख़ाशाक-ए-आशियाँ से
क्या ख़ूबी उस के मूँह की ए ग़ुन्चा नक़्ल करियेतू तो न बोल ज़ालिम बू आती है वहाँ से
ख़ामोशी में ही हम ने देखी है मसलहत अबहर इक से हाल दिल का मुद्दत कहा ज़बाँ से
इतनी भी बद् मिज़ाजी हर लहज़ा 'मीर' तुम कोउलझाव है ज़मीन से, झगड़ा है आसमाँ से
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