ग़ज़ल
जीते-जी कूचा-ऐ-दिलदार से जाया न गया
जीते-जी कूचा-ऐ-दिलदार से जाया न गयाउस की दीवार का सर से मेरे साया न गया
दिल के तईं आतिश-ऐ-हिज्राँ से बचाया न गयाघर जला सामने पर हम से बुझाया न गया
क्या तुनक हौसला थे दीदा-ओ-दिल अपने आहइक दम राज़ मोहब्बत का छुपाया न गया
दिल जो दीदार का क़ायेल की बहोत भूका थाइस सितम-कुश्ता से यक ज़ख्म भी खाया न गया
शहर-ऐ-दिल आह अजब जाए थी पर उसके गएऐसा उजड़ा कि किसी तरह बसाया ना गया
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