ग़ज़ल

चलते हो तो चमन को चलिये

मीर तक़ी मीर · सब कलाम देखें
चलते हो तो चमन को चलियेकहतए हैं कि बहाराँ है
पात हरे हैं फूल खिले हैंकम कम बाद-ओ-बाराँ है
आगे मैख़ाने को निकलोअहद-ए-बादा गुज़ाराँ है
लोहु-पानी एक करे येइश्क़-ए-लालाअज़ाराँ है
इश्क़ में हमको "मीर" निहायतपास-ए-इज़्ज़त-दाताँ है
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