ग़ज़ल

कोफ़्त से जान लब पर आई है

मीर तक़ी मीर · सब कलाम देखें
कोफ़्त से जान लब पर आई हैहम ने क्या चोट दिल पे खाई है
लिखते रुक़ा, लिख गए दफ़्तरशौक़ ने बात क्या बड़ाई है
दीदनी है शिकस्गी दिल कीक्या इमारत ग़मों ने ढाई है
है तसन्ना के लाल हैं वो लबयानि इक बात सी बबाई है
दिल से नज़दीक और इतना दूरकिस से उसको कुछ आश्नाई है
जिस मर्ज़ में के जान जाती हैदिलबरों ही की वो जुदाई है
याँ हुए ख़ाक से बराबर हमवाँ वही नाज़-ए-ख़ुदनुमाई है
मर्ग-ए-मजनूँ पे अक़्ल गुम है 'मीर'क्या दीवाने ने मौत पाई है
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