ग़ज़ल

तुम नहीं फ़ितना-साज़ सच साहब

मीर तक़ी मीर · सब कलाम देखें
तुम नहीं फ़ितना-साज़ सच साहबशहर पुर-शोर इस ग़ुलाम से है
कोई तुझसा भी काश तुझ को मिलेमुद्दा हम को इन्तक़ाम से है
शेर मेरे हैं सब ख़्वास पसंदपर मुझे गुफ़्तगू आवाम से है
सहल है 'मीर' का समझना क्याहर सुख़न उसका इक मक़ाम से है
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