ग़ज़ल
इधर से अब्र उठकर जो गया है
इधर से अब्र उठकर जो गया हैहमारी ख़ाक पर भी रो गया है
मसाइब और थे पर दिल का जानाअजब इक सानीहा सा हो गया है
मुकामिर-खाना-ऐ-आफाक वो हैके जो आया है याँ कुछ खो गया है
सरहाने 'मीर' के आहिस्ता बोलोअभी टुक रोते-रोते सो गया है
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