ग़ज़ल

इश्क़ में जी को सब्र-ओ-ताब कहाँ

मीर तक़ी मीर · सब कलाम देखें
इश्क़ में जी को सब्र-ओ-ताब कहाँउस से आँखें लगीं तो ख़्वाब कहाँ
बेकली दिल ही की तमाशा हैबर्क़ में ऐसे इज़्तेराब कहाँ
हस्ती अपनी है बीच में पर्दाहम न होवें तो फिर हिजाब कहाँ
गिरिया-ए-शब से सुर्ख़ हैं आँखेंमुझ बला नोश को शराब कहाँ
इश्क़ है आशिक़ों को जलने कोये जहन्नुम में है अज़ाब कहाँ
महव हैं इस किताबी चेहरे केआशिक़ों को सर-ए-किताब कहाँ
इश्क़ का घर है 'मीर' से आबादऐसे फिर ख़ानमाँख़राब कहाँ
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