ग़ज़ल
कागळ कोण लेई जायरे मथुरामां
कागळ कोण लेई जायरे मथुरामां वसे रेवासी मेरा प्राण पियाजी॥ध्रु०॥ए कागळमां झांझु शूं लखिये। थोडे थोडे हेत जणायरे॥१॥मित्र तमारा मळवाने इच्छे। जशोमती अन्न न खाय रे॥२॥सेजलडी तो मुने सुनी रे लागे। रडतां तो रजनी न जायरे॥३॥मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। चरनकमल तारूं त्यां जायरे॥४॥
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