ग़ज़ल
कठण थयां रे माधव मथुरां जाई
कठण थयां रे माधव मथुरां जाई। कागळ न लख्यो कटकोरे॥ध्रु०॥अहियाथकी हरी हवडां पधार्या। औद्धव साचे अटक्यारे॥१॥अंगें सोबरणीया बावा पेर्या। शीर पितांबर पटकोरे॥२॥गोकुळमां एक रास रच्यो छे। कहां न कुबड्या संग अतक्योरे॥३॥कालीसी कुबजा ने आंगें छे कुबडी। ये शूं करी जाणे लटकोरे॥४॥ये छे काळी ने ते छे। कुबडी रंगे रंग बाच्यो चटकोरे॥५॥मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। खोळामां घुंघट खटकोरे॥६॥
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