ग़ज़ल
कल नाहिं पड़त जिस
सखी मेरी नींद नसानी हो।पिवको पंथ निहारत सिगरी, रैण बिहानी हो।सखियन मिलकर सीख दई मन, एक न मानी हो।बिन देख्यां कल नाहिं पड़त जिय, ऐसी ठानी हो।अंग-अंग ब्याकुल भई मुख, पिय पिय बानी हो।अंतर बेदन बिरहकी कोई, पीर न जानी हो।ज्यूं चातक घनकूं रटै, मछली जिमि पानी हो।मीरा ब्याकुल बिरहणी, सुध बुध बिसरानी हो।
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh