ग़ज़ल
आई ती ते भिस्ती जनी जगत देखके रोई
आई ती ते भिस्ती जनी जगत देखके रोई।मातापिता भाईबंद सात नही कोई।मेरो मन रामनाम दुजा नही कोई॥ध्रु०॥साधु संग बैठे लोक लाज खोई। अब तो बात फैल गई।जानत है सब कोई॥१॥आवचन जल छीक छीक प्रेम बोल भई। अब तो मै फल भई।आमरूत फल भई॥२॥शंख चक्र गदा पद्म गला। बैजयंती माल सोई।मीरा कहे नीर लागो होनियोसी हो भई॥३॥
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