ग़ज़ल
आवत मैँ सपने हरि को लखि
आवत मैँ सपने हरि को लखि नैसुक बाँट सँकोचन छोड़ी ।आगे ह्वै आड़े भए मतिराम मँहू चितयोँ चित लालच ओड़ी ।होठन को रस लेन को आलि री मेरी गही कर काँपत ठोड़ी ।और भई न सखी कछु बात गई इतने ही मे नीँद निगोड़ी ॥
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