ग़ज़ल
कोऊ नहीँ बरजै मतिराम रहौ तितही
कोऊ नहीँ बरजै मतिराम रहौ तितही जितही मन भायो ।काहे को सौँहैँ हजार करौ तुमतो कबहूँ अपराध न ठायो ।सोवन दीजै न दीजै हमैँ दुख योँही कहा रसवाद बढ़ायो ।मान रह्योई नहीँ मनमोहन मानिनी होय सो मानै मनायो ।
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh