ग़ज़ल
चरन धरै न भूमि बिहरै तहाँई जहाँ
चरन धरै न भूमि बिहरै तहाँई जहाँ ,फूले फूले फूलनि बिछायो परयँक है ।भार डरनि सुकुमार चारु आँगन मे ,अँग ना लगावैँ चारु केसरि को पँक है ।कवि मतिराम लखि वातायन बीच आयो ,आतप मलिन होत बदन मयँक है ।कैसे सुकुमार वह बाहिर बिजन आवै ,बिजन बयारि लागे लचकत लँक है ॥
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh