ग़ज़ल
जावक लिलार ओँठ अँजन की लीक सोहै
जावक लिलार ओँठ अँजन की लीक सोहै ,खैये न अलीक लोक लीक न बिसारिए ।कवि मतिराम छाती नख छत जगमगै ,डगमगै पग सूधे मग मैँ न धारिए ।कसकै उफारत हौ पलक पलक यातैँ ,पलका पे पौढ़ि श्रम राति को निवारिए ।अटपटे बैन मुख बात न कहत बनै ,लटपटे पेँच सिर पाग के सुधारिए ॥
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