ग़ज़ल
अर्जुन की प्रतिज्ञा
उस काल मारे क्रोध के तन काँपने उसका लगा,मानों हवा के वेग से सोता हुआ सागर जगा ।मुख-बाल-रवि-सम लाल होकर ज्वाल सा बोधित हुआ,प्रलयार्थ उनके मिस वहाँ क्या काल ही क्रोधित हुआ ?
युग-नेत्र उनके जो अभी थे पूर्ण जल की धार-से,अब रोश के मारे हुए, वे दहकते अंगार-से ।निश्चय अरुणिमा-मिस अनल की जल उठी वह ज्वाल ही,तब तो दृगों का जल गया शोकाश्रु जल तत्काल ही ।
साक्षी रहे संसार करता हूँ प्रतिज्ञा पार्थ मैं,पूरा करूँगा कार्य सब कथानुसार यथार्थ मैं ।जो एक बालक को कपट से मार हँसते हैँ अभी,वे शत्रु सत्वर शोक-सागर-मग्न दीखेंगे सभी ।
अभिमन्यु-धन के निधन से कारण हुआ जो मूल है,इससे हमारे हत हृदय को, हो रहा जो शूल है,
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