ग़ज़ल

कुशलगीत

मैथिलीशरण गुप्त · सब कलाम देखें
हाँ, निशान्त आया,तूने जब टेर प्रिये, कान्त, कान्त, उठो, गाया---चौँक शकुन-कुम्भ लिये हाँ, निशान्त गाया ।आहा! यह अभिव्यक्ति,द्रवित सार-धार-शक्ति ।तृण तृण की मसृण भक्तिभाव खींच लाया ।तूने जब टेर प्रिये, "कान्त, उठो" गाया !मगध वा सूत गये,किन्तु स्वर्ग-दूत नये,तेरे स्वर पूत अये,मैंने भर पाया ।तूने जब टेर प्रिये, "कान्त, उठो" गाया ।
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