ग़ज़ल
चारु चंद्र की चंचल किरणें
चारुचंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल थल में,:स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है अवनि और अम्बरतल में।पुलक प्रकट करती है धरती, हरित तृणों की नोकों से,:मानों झीम रहे हैं तरु भी, मन्द पवन के झोंकों से॥
पंचवटी की छाया में है, सुन्दर पर्ण-कुटीर बना,:जिसके सम्मुख स्वच्छ शिला पर, धीर-वीर निर्भीकमना,जाग रहा यह कौन धनुर्धर, जब कि भुवन भर सोता है?:भोगी कुसुमायुध योगी-सा, बना दृष्टिगत होता है॥
किस व्रत में है व्रती वीर यह, निद्रा का यों त्याग किये,:राजभोग्य के योग्य विपिन में, बैठा आज विराग लिये।बना हुआ है प्रहरी जिसका, उस कुटीर में क्या धन है,:जिसकी रक्षा में रत इसका, तन है, मन है, जीवन है!
मर्त्यलोक-मालिन्य मेटने, स्वामि-संग जो आई है,:तीन लोक की लक्ष्मी ने यह, कुटी आज अपनाई है।वीर-वंश की लाज यही है, फिर क्यों वीर न हो प्रहरी,:विजन देश है निशा शेष है, निशाचरी माया ठहरी॥
कोई पास न रहने पर भी, जन-मन मौन नहीं रहता;:आप आपकी सुनता है वह, आप आपसे है कहता।बीच-बीच मे इधर-उधर निज दृष्टि डालकर मोदमयी,:मन ही मन बातें करता है, धीर धनुर्धर नई नई-
क्या ही स्वच्छ चाँदनी है यह, है क्या ही निस्तब्ध निशा;:है स्वच्छन्द-सुमंद गंध वह, निरानंद है कौन दिशा?बंद नहीं, अब भी चलते हैं, नियति-नटी के कार्य-कलाप,:पर कितने एकान्त भाव से, कितने शांत और चुपचाप!
है बिखेर देती वसुंधरा, मोती, सबके सोने पर,:रवि बटोर लेता है उनको, सदा सवेरा होने पर।और विरामदायिनी अपनी, संध्या को दे जाता है,:शून्य श्याम-तनु जिससे उसका, नया रूप झलकाता है।
सरल तरल जिन तुहिन कणों से, हँसती हर्षित होती है,:अति आत्मीया प्रकृति हमारे, साथ उन्हींसे रोती है!अनजानी भूलों पर भी वह, अदय दण्ड तो देती है,:पर बूढों को भी बच्चों-सा, सदय भाव से सेती है॥
तेरह वर्ष व्यतीत हो चुके, पर है मानो कल की बात,:वन को आते देख हमें जब, आर्त्त अचेत हुए थे तात।अब वह समय निकट ही है जब, अवधि पूर्ण होगी वन की।:किन्तु प्राप्ति होगी इस जन को, इससे बढ़कर किस धन की!
और आर्य को, राज्य-भार तो, वे प्रजार्थ ही धारेंगे,:व्यस्त रहेंगे, हम सब को भी, मानो विवश विसारेंगे।कर विचार लोकोपकार का, हमें न इससे होगा शोक;:पर अपना हित आप नहीं क्या, कर सकता है यह नरलोक!
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