ग़ज़ल
नहुष का पतन
मत्त-सा नहुष चला बैठ ऋषियान मेंव्याकुल से देव चले साथ में, विमान मेंपिछड़े तो वाहक विशेषता से भार कीअरोही अधीर हुआ प्रेरणा से मार कीदिखता है मुझे तो कठिन मार्ग कटनाअगर ये बढ़ना है तो कहूँ मैं किसे हटना?बस क्या यही है बस बैठ विधियाँ गढ़ो?अश्व से अडो ना अरे, कुछ तो बढ़ो, कुछ तो बढ़ोबार बार कन्धे फेरने को ऋषि अटकेआतुर हो राजा ने सरौष पैर पटकेक्षिप्त पद हाय! एक ऋषि को जा लगासातों ऋषियों में महा क्षोभानल आ जगाभार बहे, बातें सुने, लातें भी सहे क्या हमतु ही कह क्रूर, मौन अब भी रहें क्या हमपैर था या सांप यह, डस गया संग हीपमर पतित हो तु होकर भुंजग हीराजा हतेज हुआ शाप सुनते ही काँपमानो डस गया हो उसे जैसे पिना साँपश्वास टुटने-सी मुख-मुद्रा हुई विकला"हा ! ये हुआ क्या?" यही व्यग्र वाक्य निकलाजड़-सा सचिन्त वह नीचा सर करकेपालकी का नाल डूबते का तृण धरकेशून्य-पट-चित्र धुलता हुआ सा दृष्टि सेदेखा फिर उसने समक्ष शून्य दृष्टि सेदीख पड़ा उसको न जाने क्या समीप साचौंका एक साथ वह बुझता प्रदीप-सा -“संकट तो संकट, परन्तु यह भय क्या ?दूसरा सृजन नहीं मेरा एक लय क्या ?”सँभला अद्मय मानी वह खींचकर ढीले अंग -“कुछ नहीं स्वप्न था सो हो गया भला ही भंग.कठिन कठोर सत्य तो भी शिरोधार्य हैशांत हो महर्षि मुझे, सांप अंगीकार्य है"दुख में भी राजा मुसकराया पूर्व दर्प सेमानते हो तुम अपने को डसा सर्प सेहोते ही परन्तु पद स्पर्श भुल चुक सेमैं भी क्या डसा नहीं गया हुँ दन्डशूक सेमानता हुँ भुल हुई, खेद मुझे इसकासौंपे वही कार्य, उसे धार्य हो जो जिसकास्वर्ग से पतन, किन्तु गोत्रीणी की गोद मेंऔर जिस जोन में जो, सो उसी में मोद मेंकाल गतिशील मुझे लेके नहीं बेठैगाकिन्तु उस जीवन में विष घुस पैठेगाफिर भी खोजने का कुछ रास्ता तो उठायेगेंविष में भी अमर्त छुपा वे कृति पायेगेंमानता हुँ भुल गया नारद का कहनादैत्यों से बचाये भोग धाम रहनाआप घुसा असुर हाय मेरे ही ह्रदय मेंमानता हुँ आप लज्जा पाप अविनय मेंमानता हुँ आड ही ली मेने स्वाधिकार कीमुल में तो प्रेरणा थी काम के विकार कीमाँगता हुँ आज में शची से भी खुली क्षमाविधि से बहिर्गता में भी साधवी वह ज्यों रमामानता हुँ और सब हार नहीं मानताअपनी अगाति आज भी मैं जानताआज मेरा भुकत्योजित हो गया है स्वर्ग भीलेके दिखा दूँगा कल मैं ही अपवर्ग भीतन जिसका हो मन और आत्मा मेरा हैचिन्ता नहीं बाहर उजेला या अँधेरा हैचलना मुझे है बस अंत तक चलनागिरना ही मुख्य नहीं, मुख्य है सँभलनागिरना क्या उसका उठा ही नहीं जो कभीमैं ही तो उठा था आप गिरता हुँ जो अभीफिर भी ऊठूँगा और बढ़के रहुँगा मैंनर हूँ, पुरुष हूँ, चढ़ के रहुँगा मैंचाहे जहाँ मेरे उठने के लिये ठौर हैकिन्तु लिया भार आज मेने कुछ और हैउठना मुझे ही नहीं बस एक मात्र रीते हाथमेरा देवता भी और ऊंचा उठे मेरे साथ
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