ग़ज़ल
कोकिल
कोकिल अति सुंदर चिड़िया है,सच कहते हैं, अति बढ़िया है।जिस रंगत के कुँवर कन्हाई,उसने भी वह रंगत पाई।बौरों की सुगंध की भाँती,कुहू-कुहू यह सब दिन गाती।मन प्रसन्न होता है सुनकर,इसके मीठे बोल मनोहर।मीठी तान कान में ऐसे,आती है वंशी-धुनि जैसे।सिर ऊँचा कर मुख खोलै है,कैसी मृदु बानी बोलै है!इसमें एक और गुण भाई,जिससे यह सबके मन भाई।यह खेतों के कीड़े सारे,खा जाती है बिना बिचारे।
''रचना वर्ष: सितंबर 1901 बाल विनोद, 1970, सम्पा. लल्लीप्रसाद पांडेय''
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