ग़ज़ल

नई सुब्‍ह

कैफ़ी आज़मी · सब कलाम देखें
ये सेहत-बख़्श तड़का ये सहर की जल्वा-सामानीउफ़ुक़ सारा बना जाता है दामान-ए-चमन जैसे
छलकती रौशनी तारीकियों पे छाई जाती हैउड़ाए नाज़ियत की लाश पर कोई कफ़न जैसे
उबलती सुर्ख़ियों की ज़द पे हैं हल्क़े सियाही केपड़ी हो आग में बिखरी ग़ुलामी की रसन जैसे
शफ़क़ की चादरें रंगीं फ़ज़ा में थरथराती हैंउड़ाए लाल झण्डा इश्तिराकी अंजुमन जैसे
चली आती है शर्माई लजाई हूर-ए-बेदारीभरे घर में क़दम थम-थम के रखती है दुल्हन जैसे
फ़ज़ा गूँजी हुई है सुब्ह के ताज़ा तरानों सेसुरूद-ए-फ़त्ह पर हैं सुर्ख़ फ़ौजें नग़्मा-ज़न जैसे
हवा की नर्म लहरें गुदगुदाती हैं उमंगों कोजवाँ जज़्बात से करता हो चुहलें बाँकपन जैसे
ये सादा-सादा गर्दूं पे तबस्सुम-आफ़रीं सूरजपै-दर-पै कामयाबी से हो स्तालिन मगन जैसे
सहर के आइने में देखता हूँ हुस्न-ए-मुस्तक़बिलउतर आई है चश्म-ए-शौक़ में 'कैफ़ी' किरन जैसे
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