ग़ज़ल
तसव्वुर
ये किस तरह याद आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही होकि जैसे सचमुच निगाह के सामने खड़ी मुस्कुरा रही हो
ये जिस्म-ए-नाज़ुक, ये नर्म बाहें, हसीन गर्दन, सिडौल बाज़ूशगुफ़्ता चेहरा, सलोनी रंगत, घनेरा जूड़ा, सियाह गेसूनशीली आँखें, रसीली चितवन, दराज़ पलकें, महीन अबरूतमाम शोख़ी, तमाम बिजली, तमाम मस्ती, तमाम जादू
हज़ारों जादू जगा रही होये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो
गुलाबी लब, मुस्कुराते आरिज़, जबीं कुशादा, बुलन्द क़ामतनिगाह में बिजलियों की झिल-मिल, अदाओं में शबनमी लताफ़तधड़कता सीना, महकती साँसें, नवा में रस, अँखड़ियों में अमृतहमा हलावत, हमा मलाहत, हमा तरन्नुम, हमा नज़ाकत
लचक लचक गुनगुना रही होये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो
तो क्या मुझे तुम जला ही लोगी गले से अपने लगा ही लोगीजो फूल जूड़े से गिर पड़ा है तड़प के उस को उठा ही लोगीभड़कते शोलों, कड़कती बिजली से मेरा ख़िर्मन बचा ही लोगीघनेरी ज़ुल्फ़ों की छाँव में मुस्कुरा के मुझ को छुपा ही लोगी
कि आज तक आज़मा रही होये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो
नहीं मोहब्बत की कोई क़ीमत जो कोई क़ीमत अदा करोगीवफ़ा की फ़ुर्सत न देगी दुनिया हज़ार अज़्म-ए-वफ़ा करोगीमुझे बहलने दो रंज-ओ-ग़म से सहारे कब तक दिया करोगीजुनूँ को इतना न गुदगुदाओ, पकड़ लूँ दामन तो क्या करोगी
क़रीब बढ़ती ही आ रही होये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो
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