ग़ज़ल

काफ़िला तो चले

कैफ़ी आज़मी · सब कलाम देखें
ख़ारो-ख़स तो उठें, रास्ता तो चलेमैं अगर थक गया, काफ़िला तो चले
चाँद-सूरज बुजुर्गों के नक़्शे-क़दमख़ैर बुझने दो इनको, हवा तो चले
हाकिमे-शहर, ये भी कोई शहर हैमस्जिदें बन्द हैं, मयकदा तो चले
इसको मज़हब कहो या सियासत कहोख़ुदकुशी का हुनर तुम सिखा तो चले
इतनी लाशें मैं कैसे उठा पाऊँगाआज ईंटों की हुरमत बचा तो चले
बेलचे लाओ, खोलो ज़मीं की तहेंमैं कहाँ दफ़्न हूँ, कुछ पता तो चले
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