ग़ज़ल

दो-पहर

कैफ़ी आज़मी · सब कलाम देखें
ये जीत-हार तो इस दौर का मुक्द्दर हैये दौर जो के पुराना नही नया भी नहींये दौर जो सज़ा भी नही जज़ा भी नहींये दौर जिसका बा-जहिर कोइ खुदा भी नहीं
तुम्हारी जीत अहम है ना मेरी हार अहमके इब्तिदा भी नहीं है ये इन्तेहा भी नहींशुरु मारका-ए-जान अभी हुआ भी नहींशुरु तो ये हंगाम-ए-फ़ैसला भी नहीं
पयाम ज़ेर-ए-लब अब तक है सूर-ए-इसराफ़ीलसुना किसी ने किसी ने अभी सुना भी नहींकिया किसी ने किसी ने यकीं किया भी नहींउठा जमीं से कोई, कोई उठा भी नहीं
[पयाम = संदेसा ]
कदम कदम पर दिया है रहज़नों ने फ़रेबके अब निगाह मे तौकीर-ए-रहनुमा भी नहींउसे समझते है मंजिल जो रास्ता भी नहींवहाँ लगाते हैं डेरा जहाँ वफ़ा भी नही
[रहज़न = चोर ]
ये कारवाँ है तो अनज़ाम-ए-कारवाँ मालूमके अजनबी भी नहीं कोई आशना भी नहींकिसी से खुश भी नहीं कोई खफ़ा भी नहींकिसी का हाल मुड़ कर कोइ पूछता भी नहीं
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