ग़ज़ल
तलाश
ये बुझी सी शाम ये सहमी हुई परछाइयाँख़ून-ए-दिल भी इस फ़ज़ा में रंग भर सकता नहींआ उतर आ काँपते होंटों पे ऐ मायूस आहसक़्फ़-ए-ज़िन्दाँ पर कोई पर्वाज़ कर सकता नहींझिलमिलाए मेरी पलकों पे मह-ओ-ख़ुर भी तो क्या?इस अन्धेरे घर में इक तारा उतर सकता नहीं
लूट ली ज़ुल्मत ने रू-ए-हिन्द की ताबिन्दगीरात के काँधे पे सर रख कर सितारे सो गएवो भयानक आँधियाँ, वो अबतरी, वो ख़लफ़शारकारवाँ बे-राह हो निकला, मुसाफ़िर खो गएहैं इसी ऐवान-ए-बे-दर में यक़ीनन रहनुमाआ के क्यूँ दीवार तक नक़्श-ए-क़दम गुम हो गए
देख ऐ जोश-ए-अमल वो सक़्फ़ ये दीवार हैएक रौज़न खोल देना भी कोई दुश्वार है
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