ग़ज़ल
दस्तूर क्या ये शहरे-सितमगर के हो गए
दस्तूर क्या ये शहरे-सितमगर के हो गए ।जो सर उठा के निकले थे बे सर के हो गए ।
ये शहर तो है आप का, आवाज़ किस की थीदेखा जो मुड़ के हमने तो पत्थर के हो गए ।
जब सर ढका तो पाँव खुले फिर ये सर खुलाटुकड़े इसी में पुरखों की चादर के हो गए ।
दिल में कोई सनम ही बचा, न ख़ुदा रहाइस शहर पे ज़ुल्म भी लश्कर के हो गए ।
हम पे बहुत हँसे थे फ़रिश्ते सो देख लेंहम भी क़रीब गुम्बदे-बेदर के हो गए ।
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