ग़ज़ल
कोई ये कैसे बता ये कि वो तन्हा क्यों हैं
कोई ये कैसे बता ये के वो तन्हा क्यों हैंवो जो अपना था वो ही और किसी का क्यों हैंयही दुनिया है तो फिर ऐसी ये दुनिया क्यों हैंयही होता हैं तो आखिर यही होता क्यों हैं
एक ज़रा हाथ बढ़ा, दे तो पकड़ लें दामनउसके सीने में समा जाये हमारी धड़कनइतनी क़ुर्बत हैं तो फिर फ़ासला इतना क्यों हैं
दिल-ए-बरबाद से निकला नहीं अब तक कोईएक लुटे घर पे दिया करता हैं दस्तक कोईआस जो टूट गयी फिर से बंधाता क्यों हैं
तुम मसर्रत का कहो या इसे ग़म का रिश्ताकहते हैं प्यार का रिश्ता हैं जनम का रिश्ताहैं जनम का जो ये रिश्ता तो बदलता क्यों हैं
कुर्बत=समीपता ; मसर्रत=खुशी
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh