ग़ज़ल

कोहरे के खेत

कैफ़ी आज़मी · सब कलाम देखें
वो सर्द रात जबकि सफ़र कर रहा था मैंरंगीनियों से जर्फ़-ए-नज़र भर रहा था मैं
तेज़ी से जंगलों में उड़ी जा रही थी रेलख़्वाबीदा काएनात को चौंका रही थी रेल
मुड़ती उछलती काँपती चिंघाड़ती हुईकोहरे की वो दबीज़ रिदा फ़ाड़ती हुई
पहियों की गर्दिशों में मचलती थी रागनीआहन से आग बन के निकलती थी रागनी
पहुँची जिधर ज़मीं का कलेजा हिला दियादामन में तीरगी के गरेबाँ बना दिया
झोंके हवा के बर्फ़ बिछाते थे राह मेंजल्वे समा रहे थे लरज़ कर निगाह में
धोके से छू गईं जो कहीं सर्द उँगलियाँबिच्छू सा डंक मारने लगती थीं खिड़कियाँ
पिछले पहर का नर्म धुँदलका था पुर-फ़िशाँमायूसियों में जैसे उमीदों का कारवाँ
बे-नूर हो के डूबने वाला था माहताबकोहरे में खुप गई थी सितारों की आब-ओ-ताब
क़ब्ज़े से तीरगी के सहर छूटने को थीमशरिक़ के हाशिए में किरन फूटने को थी
कोहरे में था ढके हुए बाग़ों का ये समाँजिस तरह ज़ेर-ए-आब झलकती हों बस्तियाँ
भीगी हुई ज़मीं थी नमी सी फ़ज़ा में थीइक किश्त-ए-बर्फ़ थी कि मुअल्लक़ हवा में थी
जादू के फ़र्श सेहर के सब सक़्फ़-ओ-बाम थेदोश-ए-हवा पे परियों के सीमीं ख़ियाम थे
थी ठण्डे-ठण्डे नूर में खोई हुई निगाहढल कर फ़ज़ा में आई थी हूरों की ख़्वाब-गाह
बन-बन के फेन सू-ए-फ़लक देखता हुआदरिया चला था छोड़ के दामन ज़मीन का
इस शबनमी धुँदलके में बगुले थे यूँ रवाँमौजों पे मस्त हो के चलें जैसे मछलियाँ
डाला कभी फ़ज़ाओं में ख़त खो गए कभीझलके कभी उफ़ुक़ में निहाँ हो गए कभी
इंजन से उड़ के काँपता फिरता था यूँ धुआँलेता था लहर खेत में कोहरे के आसमाँ
उस वक़्त क्या था रूह पे सदमा न पूछिएयाद आ रहा था किस से बिछड़ना न पूछिए
दिल में कुछ ऐसे घाव थे तीर-ए-मलाल केरो-रो दिया था खिड़की से गर्दन निकाल के
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