ग़ज़ल
तुम परेशां न हो
तुम परेशां न हो बाब-ए-करम-वा न करोऔर कुछ देर पुकारूंगा चला जाऊंगाइसी कूचे में जहां चांद उगा करते थेशब-ए-तारीक गुज़ारूंगा चला जाऊंगा
रास्ता भूल गया या यहां मंज़िल है मेरीकोई लाया है या ख़ुद आया हूं मालूम नहींकहते हैं कि नज़रें भी हसीं होती हैंमैं भी कुछ लाया हूं क्या लाया मालूम नहीं
यूं तो जो कुछ था मेरे पास मैं सब कुछ बेच आयाकहीं इनाम मिला और कहीं क़ीमत भी नहींकुछ तुम्हारे लिए आंखों में छुपा रक्खा हैदेख लो और न देखो तो शिकायत भी नहीं
फिर भी इक राह में सौ तरह के मोड़ आते हैंकाश तुम को कभी तन्हाई का एहसास न होकाश ऐसा न हो ग़ैर-ए-राह-ए-दुनिया तुम कोऔर इस तरह कि जिस तरह कोई पास न हो
आज की रात जो मेरी तरह तन्हा हैमैं किसी तरह गुज़ारूंगा चला जाऊंगातुम परेशां न हो बाब-ए-करम-वा न करोऔर कुछ देर पुकारूंगा चला जाऊंगा
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