ग़ज़ल

ज़िन्दगी

कैफ़ी आज़मी · सब कलाम देखें
आज अन्धेरा मेरी नस-नस में उतर जाएगाआँखें बुझ जाएँगी बुझ जाएँगे एहसास ओ शुऊरऔर ये सदियों से जलता-सा सुलगता-सा वजूदइस से पहले कि सहर माथे पे शबनम छिड़केइस से पहले कि मेरी बेटी के वो फूल से हाथगर्म रुख़्सार को ठण्डक बख़्शेंइस से पहले कि मेरे बेटे का मज़बूत बदनतन-ए-मफ़्लूज में शक्ति भर देइस से पहले कि मेरी बीवी के होंटमेरे होंटों की तपिश पी जाएँराख हो जाएगा जलते-जलतेऔर फिर राख बिखर जाएगी
ज़िन्दगी कहने को बे-माया सहीग़म का सरमाया सहीमैं ने इस के लिए क्या-क्या न कियाकभी आसानी से इक साँस भी यमराज को अपना न दियाआज से पहले, बहुत पहलेइसी आँगन मेंधूप-भरे दामन मेंमैं खड़ा था मिरे तलवों से धुआँ उठता थाएक बे-नाम सा बे-रंग सा ख़ौफ़कच्चे एहसास पे छाया था कि जल जाऊँगामैं पिघल जाऊँगाऔर पिघल कर मिरा कमज़ोर सा 'मैं'क़तरा-क़तरा मेरे माथे से टपक जाएगारो रहा था मगर अश्कों के बग़ैरचीख़ता था मगर आवाज़ न थीमौत लहराती थी सौ शक़्लों मेंमैं ने हर शक़्ल को घबरा के ख़ुदा मान लियाकाट के रख दिए सन्दल के पुर-असरार दरख़्तऔर पत्थर से निकाला शोलाऔर रौशन किया अपने से बड़ा एक अलावजानवर ज़ब्ह किए इतने कि ख़ूँ की लहरेंपाँव से उठ के कमर तक आईं
और कमर से मिरे सर तक आईंसोम-रस मैं ने पियारात दिन रक़्स कियानाचते-नाचते तलवे मिरे ख़ूँ देने लगेमिरे आज़ा की थकनबन गई काँपते होंटों पे भजनहड्डियाँ मेरी चटख़ने लगीं ईंधन की तरहमन्तर होंटों से टपकने लगे रोग़न की तरह''अग्नि माता मिरी अग्नि मातासूखी लकड़ी के ये भारी कुन्देजो तिरी भेंट को ले आया हूँउन को स्वीकार कर और ऐसे धधककि मचलते शोले खींच लें जोश मेंसूरज की सुनहरी ज़ुल्फ़ेंआग में आग मिलेजो अमर कर दे मुझेऐसा कोई राग मिले''
अग्नि माँ से भी न जीने की सनद जब पाईज़िन्दगी के नए इम्कान ने ली अंगड़ाईऔर कानों में कहीं दूर से आवाज़ आईबुद्धम् शरणम् गच्छामिधम्मम् शरणम् गच्छामिसंघम् शरणम् गच्छामिचार अबरू का सफ़ाया कर केबे-सिले वस्त्र से ढाँपा ये बदनपोंछ के पत्नी के माथे से दमकती बिन्दियासोते बच्चों को बिना प्यार किएचल पड़ा हाथ में कश्कोल लिएचाहता था कहीं भिक्षा ही में जीवन मिल जाएजो कभी बन्द न हो दिल को वो धड़कन मिल जाएमुझ को भिक्षा में मगर ज़हर मिलाहोंट थर्राने लगे जैसे करे कोई गिलाझुक के सूली से उसी वक़्त किसी ने ये कहातेरे इक गाल पे जिस पल कोई थप्पड़ मारेदूसरा गाल भी आगे कर देतेरी दुनिया में बहुत हिंसा हैउस के सीने में अहिंसा भर देकि ये जीने का तरीक़ा भी है अन्दाज़ भी हैतेरी आवाज़ भी है मेरी आवाज़ भी हैमैं उठा जिस को अहिंसा का सबक़ सिखलानेमुझ को लटका दिया सूली पे उसी दुनिया ने
आ रहा था मैं कई कूचों से ठोकर खा करएक आवाज़ ने रोका मुझ कोकिसी मीनार से नीचे आ करअल्लाहु-अकबर अल्लाहु-अकबरहुआ दिल को ये गुमाँकि ये पुर-जोश अज़ाँमौत से देगी अमाँफिर तो पहुँचा मैं जहाँमैं ने दोहराई कुछ ऐसे ये अज़ाँगूँज उठा सारा जहाँअल्लाहु-अकबर अल्लाहु-अकबरइसी आवाज़ में इक और भी गूँजा एलानकुल्लो-मन-अलैहा-फ़ानइक तरफ़ ढल गया ख़ुर्शीद-ए-जहाँ-ताब का सरहुआ फ़ालिज का असरफट गई नस कोई शिरयानों में ख़ूँ जम-सा गयाहो गया ज़ख़्मी दिमाग़ऐसा लगता था कि बुझ जाएगा जलता है जो सदियों से चराग़आज अन्धेरा मिरी नस नस में उतर जाएगाये समुन्दर जो बड़ी देर से तूफ़ानी थाऐसा तड़पा कि मिरे कमरे के अन्दर आयाआते-आते वो मिरे वास्ते अमृत लायाऔर लहरा के कहाशिव ने ये भेजवाया है लो पियो औरआज शिव इल्म है अमृत है अमलअब वो आसाँ है जो दुश्वार था कलरात जो मौत का पैग़ाम लिए आई थीबीवी बच्चों ने मिरेउस को खिड़की से परे फेंक दियाऔर जो वो ज़हर का इक जाम लिए आई थीउस ने वो ख़ुद ही पियासुब्ह उतरी जो समुन्दर में नहाने के लिएरात की लाश मिली पानी में
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