ग़ज़ल
ताजमहल
दोस्त ! मैं देख चुका ताजमहल...वापस चल
मरमरीं-मरमरीं फूलों से उबलता हीराचाँद की आँच में दहके हुए सीमीं मीनारज़ेहन-ए-शाएर से ये करता हुआ चश्मक पैहमएक मलिका का ज़िया-पोश ओ फ़ज़ा-ताब मज़ार
ख़ुद ब-ख़ुद फिर गए नज़रों में ब-अंदाज़-ए-सवालवो जो रस्तों पे पड़े रहते हैं लाशों की तरहख़ुश्क हो कर जो सिमट जाते हैं बे-रस आसाबधूप में खोपड़ियाँ बजती हैं ताशों की तरह
दोस्त ! मैं देख चुका ताजमहल...वापस चल
ये धड़कता हुआ गुम्बद में दिल-ए-शाहजहाँये दर-ओ-बाम पे हँसता हुआ मलिका का शबाबजगमगाता है हर इक तह से मज़ाक़-ए-तफ़रीक़और तारीख़ उढ़ाती है मोहब्बत की नक़ाब
चाँदनी और ये महल आलम-ए-हैरत की क़समदूध की नहर में जिस तरह उबाल आ जाएऐसे सय्याह की नज़रों में खुपे क्या ये समाँजिस को फ़रहाद की क़िस्मत का ख़याल आ जाए
दोस्त ! मैं देख चुका ताजमहल...वापस चल
ये दमकती हुई चौखट ये तिला-पोश कलसइन्हीं जल्वों ने दिया क़ब्र-परस्ती को रिवाजमाह ओ अंजुम भी हुए जाते हैं मजबूर-ए-सुजूदवाह आराम-गह-ए-मलिका-ए-माबूद-मिज़ाज
दीदनी क़स्र नहीं दीदनी तक़्सीम है येरू-ए-हस्ती पे धुआँ क़ब्र पे रक़्स-ए-अनवारफैल जाए इसी रौज़ा का जो सिमटा दामनकितने जाँ-दार जनाज़ों को भी मिल जाए मज़ार
दोस्त ! मैं देख चुका ताजमहल...वापस चल
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