ग़ज़ल
कुछ इस अदा से आज वो पहलू-नशीं रहे
कुछ इस अदा से आज वो पहलू-नशीं रहेजब तक हमारे पास रहे हम नहीं रहे
ईमान-ओ-कुफ़्र और न दुनिया-ओ- दीं रहेऐ इश्क़ !शादबाश कि तनहा हमीं रहे
या रब किसी के राज़-ए-मोहब्बत की ख़ैर होदस्त-ए-जुनूँ रहे न रहे आस्तीं रहे
जा और कोई ज़ब्त की दुनिया तलाश करऐ इश्क़ हम तो अब तेरे क़ाबिल नहीं रहे
मुझ को नहीं क़ुबूल दो आलम की वुस'अतेंक़िस्मत में कू-ए-यार की दो ग़ज़ ज़मीं रहे
दर्द-ए-ग़म-ए-फ़िराक़ के ये सख़्त- मरहलेहैरां हूँ मैं कि फिर भी तुम इतने हसीं रहे
इस इश्क़ की तलाफ़ी-ए-माफ़ात देखनारोने की हसरतें हैं जब आँसू नहीं रहे
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