ग़ज़ल

ज़र्रों से बातें करते हैं दीवारोदर से हम

जिगर मुरादाबादी · सब कलाम देखें
ज़र्रों से बातें करते हैं दीवारोदर से हम।मायूस किस क़दर है, तेरी रहगुज़र से हम॥
कोई हसीं हसीं ही ठहरता नहीं ‘जिगर’।बाज़ आये इस बुलन्दिये-ज़ौक़े-नज़र से हम॥
इतनी-सी बात पर है बस इक जंगेज़रगरी।पहले उधर से बढ़ते हैं वो या इधर से हम॥
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