ग़ज़ल

तुझी से इब्तिदा है, तू ही इक दिन इंतिहा होगा

जिगर मुरादाबादी · सब कलाम देखें
तुझी से इब्तिदा है तू ही इक दिन इंतिहा होगासदा-ए-साज़ होगी और न जाने साज-ए-बे-सदा होगा
हमें मालूम है हम से सुनो महशर में क्या होगासब उसको देखते होंगे वो हमको देखता होगा
सर-ए-महशर हम ऐसे आसियों का और क्या होगादर-ए-जन्नत न वा होगा दर-ए-रहमत तो वा होगा
जहन्नुम हो कि जन्नत जो भी होगा फ़ैसला होगाये क्या कम है हमारा और उनका सामना होगा
अज़ल हो या अबद दोनों असीर-ए-ज़ुल्फ़-ए-हज़रत हैंजिधर नज़रें उठाओगे यही इक सिलसिला होगा
ये निस्बत इश्क़ की बे-रंग लाये रह नहीं सकतीजो महबूब-ए-ख़ुदा का है वो महबूब-ए-ख़ुदा होगा
इसी उम्मीद पर हम तालिबान-ए-दर्द जीते हैंखोशा दर्द दे कि तेरा और दर्द-ए-ला-दवा होगा
निगाहे-क़हर पर भी जानो-दिल सब खोए बैठा हैनिगाहे-मेहर आशिक़ पर अगर होगी तो क्या होगा
सयाना भेज देगा हमको महशर से जहन्नुम मेंमगर जो दिल पे गुज़रेगी वो दिल ही जानता होगा
समझता क्या है तू दीवानगान-ए-इश्क़ को ज़ाहिदये हो जायेंगे जिस जानिब उसी जानिब खुदा होगा
'जिगर' का हाथ होगा हश्र में और दामन-ए-हज़रतशिकायत हो कि शिकवा जो भी होगा बरमला होगा
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