ग़ज़ल
आँखों में बस के दिल में समा कर चले गये
आँखों में बस के दिल में समा कर चले गयेख़्वाबिदा ज़िन्दगी थी जगा कर चले गये
चेहरे तक आस्तीन वो लाकर चले गयेक्या राज़ था कि जिस को छिपाकर चले गये
रग-रग में इस तरह वो समा कर चले गयेजैसे मुझ ही को मुझसे चुराकर चले गये
आये थे दिल की प्यास बुझाने के वास्तेइक आग सी वो और लगा कर चले गये
लब थरथरा के रह गये लेकिन वो ऐ "ज़िगर"जाते हुये निगाह मिलाकर चले गये
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