ग़ज़ल
इसी चमन में ही हमारा भी इक ज़माना था
इसी चमन में ही हमारा भी इक ज़माना थायहीं कहीं कोई सादा सा आशियाना था
नसीब अब तो नहीं शाख़ भी नशेमन कीलदा हुआ कभी फूलों से आशियाना था
तेरी क़सम अरे ओ जल्द रूठनेवालेगुरूर-ए-इश्क़ न था नाज़-ए-आशिक़ाना था
तुम्हीं गुज़र गये दामन बचाकर वर्ना यहाँवही शबाब वही दिल वही ज़माना था
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh